हमारी वसीयत और विरासत (भाग 124): तपश्चर्या— आत्मशक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य
तपश्चर्या के मौलिक सिद्धांत हैं— संयम और सदुपयोग। इंद्रियसंयम से— पेट ठीक रहने से स्वास्थ्य नहीं बिगड़ता। ब्रह्मचर्यपालन से मनोबल का भंडार चुकने नहीं पाता। अर्थसंयम से— नीति की कमाई से औसत भारतीय स्तर का निर्वाह करना पड़ता है; फलतः न दरिद्रता फटकती है और न बेईमानी की आवश्यकता पड़ती है। समयसंयम से व्यस्त दिनचर्या बनाकर चलना पड़ता है और श्रम तथा मनोयोग को निर्धारित सत्प्रयोजनों में लगाए रहना पड़ता है। फलतः कुकर्मों के लिए समय ही नहीं बचता। जो बन पड़ता है, श्रेष्ठ और सार्थक ही होता है। विचारसंयम से एकात्मता सधती है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता का दृष्टिकोण विकसित होता है।
भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना सहज सधती रहती है। संयम का अर्थ है— बचत। चारों प्रकार का संयम बरतने पर मनुष्य के पास इतनी अधिक सामर्थ्य बच रहती है, जिसे परिवार निर्वाह के अतिरिक्त महान प्रयोजनों में प्रचुर मात्रा में भली प्रकार लगाया जाता रहे। संयमशीलों को वासना, तृष्णा और अहंता की खाई पाटने में मरना-खपना नहीं पड़ता। इसलिए सदुद्देश्यों की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता पड़ने पर व्यस्तता, अभावग्रस्तता, चिंता, समस्या आदि के बहाने नहीं गढ़ने पड़ते। स्वार्थ-परमार्थ साथ-साथ सधते रहते हैं और हँसती-हँसाती, हलकी-फुलकी जिंदगी जीने का अवसर मिल जाता है। इसी मार्ग पर अब से 60 वर्ष पूर्व मार्गदर्शक ने चलना सिखाया था। वह क्रम अनवरत रूप से चलता रहा। जब भी वातावरण में बैटरी चार्ज करने के लिए बुलाया जाता रहा।
विगत तीस वर्षों में एक-एक वर्ष के लिए एकांतवास और विशेष साधना-उपक्रम के लिए जाना पड़ा है। इसका उद्देश्य एक ही था। तपश्चर्या के उत्साह और पुरुषार्थ में— श्रद्धा और विश्वास में कहीं कोई कमी न पड़ने पाए। जहाँ कमी पड़ रही हो, उसकी भरपाई होती रहे। भगीरथशिला— गंगोत्री में की गई साधना से धरती पर ज्ञानगंगा की— प्रज्ञा अभियान की— अवतरण की क्षमता एवं दिशा मिली। एक बार उत्तरकाशी के परशुराम आश्रम में वह कुल्हाड़ा उपलब्ध हुआ, जिसके सहारे व्यापक अवांछनीयता के प्रति लोक-मानस में विक्षोभ एवं आक्रोश उत्पन्न किया जा सके। पौराणिक परशुराम ने धरती पर से अनेक आततायियों के अनेक बार सिर काटे थे। अपना सिर काटना ‘ब्रेन वॉशिंग’ है। विचार-क्रांति एवं प्रज्ञा अभियान में सृजनात्मक ही नहीं, सुधारात्मक प्रयोजन भी सम्मिलित हैं। यह दोनों ही उद्देश्य जिस प्रकार, जितने व्यापक क्षेत्र में, जितनी सफलता के साथ संपन्न होते रहे हैं, उनमें न शक्तिकौशल है, न साधनों का चमत्कार, न परिस्थितियों का संयोग। यह मात्र तपश्चर्या की सामर्थ्य से ही संपन्न हो सका।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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