हमारी वसीयत और विरासत (भाग 125): तपश्चर्या— आत्मशक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य
यह जीवनचर्या के अद्यावधि भूतकाल का विवरण हुआ। वर्तमान में इसी दिशा में एक बड़ी छलांग लगाने के लिए उस शक्ति ने निर्देश किया है, जिस सूत्रधार के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते हुए समूचा जीवन गुजर गया। अब हमें तपश्चर्या की एक नवीन उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश करना पड़ा है। सर्वसाधारण को इतना ही पता है कि हम एकांतवास में हैं; किसी से मिल-जुल नहीं रहे हैं। यह जानकारी सर्वथा अधूरी है; क्योंकि जिस व्यक्ति के रोम-रोम में कर्मठता, पुरुषार्थपरायणता, नियमितता, व्यवस्था भरी पड़ी हो, वह इस प्रकार का निरर्थक और निष्क्रिय जीवन जी ही नहीं सकता, जैसा कि समझा जा रहा है। एकांतवास में हमें पहले की अपेक्षा अधिक श्रम करना पड़ा है। अधिक व्यस्त रहना पड़ा है तथा लोगों से न मिलने की विधा अपनाने पर भी इतनों से, ऐसों से संपर्क-सूत्र जोड़ना पड़ा है, जिनके साथ बैठने में ढेरों-का-ढेरों समय चला जाता है, पर मन नहीं भरता। फिर एकांत कहाँ हुआ? न मिलने की बात कहाँ बन पड़ी? मात्र कार्यशैली में ही राई रत्ती परिवर्तन हुआ। मिलने-जुलने वालों का वर्ग एवं विषय भर बदला। ऐसी दशा में अकर्मण्य और पलायनवाद का दोष ऊपर कहाँ लदा? तपस्वी सदा ऐसी ही रीति-नीति अपनाते हैं। वे निष्क्रिय दीखते भर हैं। वस्तुतः अत्यधिक व्यस्त रहते हैं। लट्टू जब पूरे वेग से घूमता है, तब स्थिर खड़ा भर दीखता है। उसके घूमने का पता तो तब चलता है, जब चाल धीमी पड़ती है और बैलेंस लड़खड़ाने पर औंधा गिरने लगता है।
आइंस्टीन जिन दिनों अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अणु अनुसंधान में लगे थे, उन दिनों उनकी जीवनचर्या में विशेष प्रकार का परिवर्तन किया गया था। वे भव्य भवन में एकाकी रहते थे। सभी साधन-सुविधाएँ उसमें उपलब्ध थीं; साहित्य, प्रयोग-उपकरण एवं सेवक-सहायक भी। वे सभी दूर रखे जाते थे, ताकि एकांत में— एकाग्रतापूर्वक बन पड़ने वाले चिंतन में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। वे जब तक चाहते, नितांत एकांत में सर्वथा एकाकी रहते। कोई उनके कार्य में तनिक भी विक्षेप नहीं कर सकता था। जब वे चाहते, घंटी बजाकर नौकर बुलाते और सभी वस्तु या व्यक्ति प्राप्त कर लेते। मिलने वाले मात्र कार्ड जमा कर जाते और जब कभी उन्हें बुलाया जाता, तब की महीनों प्रतीक्षा करते। घनिष्ठता बताकर कोई भी उनके कार्य में विक्षेप नहीं कर सकता था। इतना प्रबंध बन पड़ने पर ही उनके लिए यह संभव हुआ कि संसार को आश्चर्यचकित कर देने वाली— मनुष्य जाति को महान अनुदान देने वाली उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सके। यदि यार बाशों से घिरे रहते; उथले कार्यों में रस लेकर समय गुजारते, तो अन्यान्यों की तरह वे भी बहुमूल्य जीवन का कोई कहने लायक लाभ न उठा पाते। प्राचीनकाल में ऋषि-तपस्वियों की जीवनचर्या ठीक इसी प्रकार की थी। उनके सामने आत्म-विज्ञान से संबंधित अगणित अनुसंधान कार्य थे। उनमें तन्यमतापूर्वक अपना कार्य कर सकने के लिए वे कोलाहल रहित स्थान निर्धारित करते थे और पूरी तरह तन्मयता के साथ निर्धारित प्रयोजनों में लगे रहते थे।
अपने सामने भी प्रायः इसी स्तर के नए कार्य करने के लिए रख दिए गए। वे बहुत वजनदार हैं; साथ ही बहुत महत्त्वपूर्ण भी। इनमें से एक है— विश्वव्यापी सर्वनाशी विभीषिकाओं को निरस्त कर सकने योग्य आत्मशक्ति उत्पन्न करना। दूसरा है— सृजनशिल्पियों को जिस प्रेरणा और क्षमता के बिना कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ रहा है, उसकी पूर्ति करना। तीसरा है— नवयुग के लिए जिन सत्प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन होना है, उनका ताना-बाना बुनना और ढाँचा खड़ा करना। यह तीनों ही कार्य ऐसे हैं, जो अकेले स्थूलशरीर से नहीं बन सकते। उसकी सीमा और सामर्थ्य अतिन्यून है। इंद्रिय सामर्थ्य थोड़े दायरे में काम कर सकती है और सीमित वजन उठा सकती है। हाड़-मांस के पिंड में बोलने-सोचने, चलने-फिरने, करने-कमाने, पचाने की बहुत थोड़ी सामर्थ्य है। उतने भर से सीमित काम हो सकता है। सीमित कार्य से शरीरयात्रा चल सकती है और समीपवर्ती संबद्ध लोगों का यत्किंचित् भला हो सकता है। अधिक व्यापक और अधिक बड़े कामों के लिए सूक्ष्म और कारणशरीरों के विकसित किए जाने की आवश्यकता पड़ती है। तीनों जब समान रूप में सामर्थ्यवान और गतिशील होते हैं, तब कहीं इतने बड़े काम बन सकते हैं, जिनके करने की इन दिनों आवश्यकता पड़ गई है।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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