युग परिवर्तन क्यों ? किसलिए ?
प्रज्ञावतार का लीला- संदोह एवं परिवर्तन की वेलाइन दिनों प्रगति और चमक- दमक का माहौल है, पर उसकी पन्नी उघाड़ते हो सड़न भरा विषघट प्रकट होता है। विज्ञान, शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र की प्रगति सभी के सामने अपनी चकाचौंध प्रस्तुत करती है। आशा की गई थी कि इस उपलब्धि के आधार पर मनुष्य को अधिक, सुखी ,समुन्नत प्रगतिशील, सुसंपन्न सभ्य, सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलेगा ।। हुआ ठीक उलटा। मनुष्य के दृष्टिकोण चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता घुस पड़ने से संकीर्ण स्वार्थपरता और मत्स्य- न्याय जैसी अतिक्रमाणता यह प्रवाह चल पड़ा। मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्ट आदर्शवादिता की उपेक्षा अवमानना और विलास, संचय, पक्षपात, तथा अहंकार का दौर चल पड़ा लोभ, मोह और अहंकार को कभी शत्रु मानने, बचने, छोड़ने की शालीनता अपनाई जाती थी अब उसका अता-पता नहीं दीखता और हर व्यक्ति उन्हें के लिए मरता दीखता है। परंपरा उलटी तो परिणति भी विघातक' होनी चाहिए थी, हो भी रही है। शक्ति संपन्नता पक ओर- विनाश दूसरी ओर देखकर हैरानी तो अवश्य होती है, पर यह समझने में भी देर नहीं लगती कि भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण अपनाने पर भौतिक समृद्धि से अपना ही गला कटता है,अपनी ही माचिस से आत्मदाह जैसा उपक्रम बनता है। चौधियाने वाली परत का पदों उखाड़ते ही प्रतीत होता है कि' सब कुछ खोखला हो चला और धुना हुआ शहतीर किसी भी क्षण धराशायी होने की स्थिति मैं पहुँच गया। जन- जन का स्वास्थ्य खोखला होता जा रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से हर काया जर्जर हो रही है। तीस आधी अधूरी आयुष्य पूरी होते- होते मौत के मुँह में घुस पड़ते हैं।
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