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Magazine - Year 1946 - Version 2

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श्राद्ध का रहस्य

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श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धा पूर्वक किये हुए कार्य को श्राद्ध कहते हैं। सत्कार्यों के लिए, सत्पुरुषों के लिए, सद्भावों के लिए अन्दर की, कृतज्ञता की भावना रखना श्रद्धा कहलाता है। उपकारी, तत्वों के प्रति आदर प्रकट करना, जिन्होंने अपने को किसी प्रकार लाभ पहुँचाया है उनके लिए कृतज्ञ होना श्रद्धालु का आवश्यक कर्त्तव्य है। ऐसी श्रद्धा हिन्दू धर्म का मेरुदंड है। इस श्रद्धा को हटा दिया जाय तो हिन्दू धर्म की सारी महत्ता नष्ट हो जायेगी और वह एक निःस्वत्व छूँछ मात्र रह जायेगा। श्रद्धा हिन्दू धर्म का एक अंग है इसलिए श्राद्ध उसका धार्मिक कृत्य है।

माता-पिता और गुरु के प्रयत्न से बालक का विकास होता है। इन तीनों का उपकार मनुष्य के ऊपर बहुत अधिक होता है। उस उपकार के बदले में बालक को इन तीनों के प्रति अटूट श्रद्धा मन में धारण किये रहने का शास्त्रकारों ने आदेश किया है। ‘मातृ देवों भव, पितृ देवों भव, आचार्य देवों भव’ इन श्रुतियों में इन्हें देव-नर तनधारी देव मानने और श्रद्धा रखने का विधान किया है। स्मृतिकारों ने माता को ब्रह्मा, पिता को विष्णु और आचार्य को शिव का स्थान दिया है। यह कृतज्ञता की भावना सदैव बनी रहे, इसलिए गुरुजनों का चरण स्पर्श, अभिवन्दन करना नित्य धर्मकृत्यों में सम्मिलित किया गया है। यह कृतज्ञता की भावना जीवन भर धारण किये रहना आवश्यक है। यदि इन गुरुजनों का स्वर्गवास हो जाय तो भी मनुष्य की वह श्रद्धा कायम रखनी चाहिए। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात पितृ पक्षों में मृत्यु की वर्ष तिथि के दिन, पर्व समारोहों पर श्राद्ध करने का श्रुति स्मृतियों में विधान पाया जाता है। नित्य की संध्या के साथ तर्पण जुड़ा हुआ है। जल की एक अंजुली भर कर हम स्वर्गीय पितृ देवों के चरणों में उसे अर्पित कर देते हैं। उनके नित्य चरण स्पर्श अभिवन्दन की क्रिया दूसरे रूप में इस प्रकार पूरी होती है। जीवित और मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का यह धर्मकृत्य किसी न किसी रूप में मनुष्य पूरा करता है और एक आत्म संतोष का अनुभव करता है।

किन्हीं विशेष अवसरों पर श्राद्ध पर्वों में हम अपने पूर्वजों के लिए ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान करते हैं और यह आशा करते हैं कि वह वस्तुएं हमारे पितृ देवों को प्राप्त होंगी। इस संबंध में आज एक तर्क उपस्थित किया जाता है कि दान की हुई वस्तुएं पितरों को नहीं पहुँचेंगी। स्थूल दृष्टि से भौतिकवादी दृष्टि कोण से यह विचार ठीक भी है। जो पदार्थ श्राद्ध में दान दिये जाते हैं वे सब उसी के पास रहते हैं जिसे दिए जाते हैं। खिलाया हुआ भोजन निमंत्रित व्यक्ति के पेट में जाता है तथा धन, वस्त्र आदि उसके घर जाते हैं। यह बात इतनी स्पष्ट है जिसके लिए कोई तर्क उपस्थित करने की आवश्यकता नहीं। जो व्यक्ति श्राद्ध करता है वह भी इस बात को भली प्रकार जानता है कि जो वस्तुएं दान दी गई थीं वे कहीं उड़ नहीं गई वरन् जिसने दान लिया था उसी के प्रयोग में आई हैं। इस प्रत्यक्ष बात में किसी तर्क की गुँजाइश नहीं है।

अब प्रश्न दान के फल के संबंध में रह जाता है। यदि यह भी कहा जाय कि दान का पुण्य फल दाता को ही मिलता है तो इसमें श्राद्ध की अनुपयोगिता सिद्ध नहीं होती। मनुष्य को लोभवश दान आदि सत्कर्मों में प्रायः अरुचि रहती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आचार्यों ने कुछ पर्व, उत्सव, स्थान, काल ऐसे नियत किये हैं जिन पर दान करने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया गया है। उन विशिष्ट पर्वों, अवसरों, पर दान करने के विविध भेद प्रभेद और महात्म्यों का वर्णन किया गया है। मनुष्य में विवेक का अंश कम और रूढ़ि का अंश अधिक होता है। जैसे स्वास्थ्य ठीक न होते हुए भी त्यौहारों के दिन रूढ़ि वश लोग पकवान ही बनाते और खाते हैं उसी प्रकार नियत अवसरों पर अनिच्छा होते हुए भी दानादि सत्कर्म करने पड़ते हैं। उत्तम कर्म का फल उत्तम होता है चाहे वह इच्छा से, अनिच्छा से, या किसी विशेष अभिप्राय से किया जाय। श्राद्ध के बहाने जो दान धर्म किया जाता है उसका फल उस दान करने वाले व्यक्ति को अवश्य ही प्राप्त होगा। यदि वह पुण्य फल स्वर्गीय पितर को प्राप्त न होता हो तो भी दान करने वाले के लिए वह कल्याण कारक है ही। सत्कर्म कभी भी निरर्थक नहीं जाते। श्राद्ध की उपयोगिता इसलिए भी है कि इस रूढ़ि के कारण अनिच्छा पूर्वक भी धर्म करने के लिए विवश होना पड़ता है।

श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है वह श्राद्ध कहा जाता है। जीवित पितरों-गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने-श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है। परन्तु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने का अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निर्मित श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता। हम अपने अवतारों देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयन्तियाँ धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। यदि कहा जाय कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा उनकी जयंतियाँ मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेक पूर्ण होगा। मनुष्य मिट्टी का खिलौना नहीं है जो फूट जाने पर कूड़े के ढेर में तिरस्कार पूर्वक फेंक दिया जाय। उसका कीर्ति शरीर युग युगान्तरों तक बना रहता है, और वह उतना ही काम करता रहता है जितना कि जीवित शरीर काम करता है। आज मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर कृष्ण, दानी कर्ण, त्यागी दधीचि, सत्यवादी हरिश्चन्द्र, ध्रुव, प्रहलाद, वीर हकीकत राय, वन्दा वैरागी, शिवाजी, राणाप्रताप, तपस्वी तिलक, शंकराचार्य, गौतम बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर आदि जीवित नहीं हैं, पर उनका कीर्ति-शरीर उतना ही काम करता है जितना कि उनके जीवित शरीर ने किया था। करोड़ों व्यक्तियों को उनसे प्रेरणा और प्रकाश प्राप्त होता है।

मनुष्य प्राणी भावना प्रधान है। व्यापारिक दृष्टि कोण से ही वह हर पहलू को नहीं सोचता, वरन् अधिकाँश कार्य अपनी अन्तःवृत्तियों को तृप्त करने के लिए करता है। वृद्ध पुरुषों की सेवा, बालकों के भरण-पोषण की कठिनाई, पीड़ितों की सहायता, पुण्य परोपकार आदि में व्यापारिक दृष्टि से कोई फायदा नहीं। यदि केवल व्यापार बुद्धि ही प्रधान हो तो बूढ़े माता-पिता को कोई रोटी न दे? बच्चों को पालने पोसने, पढ़ाने, विवाह आदि करने का झंझट उठाने के लिए कोई तैयार न हो, दीन दुखियों की सहायता में कोई समय या पैसा न दे? ऐसी प्रवृत्ति हो जाने पर तो मानव जाति पिशाचों की सेना बन जायेगी। पर सौभाग्य से ऐसी बात नहीं है। मनुष्य भावनाशील प्राणी है, वह प्रत्यक्ष लाभ की अपेक्षा अप्रत्यक्ष, हृदय गत भावनाओं को प्रधानता देता है। कृतज्ञता उसकी श्रेष्ठ वृत्ति है। इसे वह जीवितों के प्रति ही प्रकट करके संतुष्ट नहीं रह सकता। मृतकों के उपकारों के लिए भी उसे श्राद्ध करना पड़ता है।

संसार के सभी देशों में, सभी धर्मों में सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसार भर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मन्दिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं। ‘क्या फायदा?’ वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावतः कृतज्ञ होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का, प्रत्युपकार स्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले तब तक उसे आन्तरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है। ताजमहल क्या है? एक पत्नी का उसके पति द्वारा किया हुआ श्राद्ध है। इस श्राद्ध से उस पति को क्या फायदा हुआ यह नहीं कहा जा सकता पर इतना निश्चित है कि पति की अन्तरात्मा को इससे बड़ी शान्ति मिली होगी।

औरंगजेब को उसके पुत्र शाहजहाँ ने कैद करके जेल में पटक दिया और स्वयं राजा बन गया। जेल में सड़ते-सड़ते औरंगजेब जब मृत्यु के निकट पहुँचा तो उसने आँखों में आँसू भर कर कहा- ‘मेरे इस्लाम परस्त बेटे से तो वे काफिर (हिन्दू) अच्छे जो मृतक पितरों तक को पानी पिलाते हैं।’ श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता का सात्विक वृत्तियों को जागृत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित, जागृत रहना संसार की सुख शाँति के लिए नितान्त आवश्यक है। उस आवश्यक वृत्ति का पोषण करने वाले श्राद्ध जैसे अनुष्ठान भी आवश्यक हैं। -अपूर्ण

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