साधकों के अंतर्जगत पर छा रहा है वासन्ती उल्लास
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जाग्रत आत्माओं पर ऊर्ध्वगामी उल्लास की तरह उतरने वाले दैवी सन्देश का महापर्व वसन्त अब आ ही नहीं गया- चारों ओर छा भी चुका है। अपने परिवार के अधिकाँश व्यक्तियों को एक ही प्रकार की आन्तरिक अनुभूतियाँ हो रही हैं कि उन्हें मूर्च्छितों की तरह अस्त-व्यस्त स्थिति में नहीं पड़े रहना चाहिए, बल्कि ऐसी रीति-नीति अपनानी चाहिए जिसे जाग्रतों-जीवंतों एवं उत्कृष्ट साधकों के अनुरूप कहा जा सके।
लगता है कोई भीतर से उमड़ता-घुमड़ता है और बंदीगृह में पड़े रहने से इनकार करता है। बन्धनों से छूटकर महाकाल का यशस्वी सेवक-सहचर बनना चाहता है। यह कौन है? प्रतीत होता है कि यह अपना ही अन्तरात्मा है, जिसे बगैर युगधर्म निभाएँ-बिना तप-साधना की भट्टी में अपने को गलाए-तपाए किसी भी तरह चैन नहीं है। यह प्रक्रिया कितनी भी कष्टकर हो, पर इसे निभाए बिना इन दिनों रहा भी तो नहीं जाता।
इन दिनों युगनिर्माण परिवार के प्रायः सभी परिजनों की अन्तः भूमिका में ऐसी ही तीव्र उथल-पुथल मची हुई है। लगता है कोई समर्थसत्ता उन्हें झकझोर रही है और कह रही है कि अरुणोदय की इस पुण्यवेला में वही किया जाना चाहिए जो तपस्वी साधकों के लिए शोभनीय है। वह नहीं होते रहना चाहिए, जिसे मूर्च्छित और अविकसित मनोभूमि के पिछड़े व्यक्तित्व के लोग अपनाए रहते हैं। क्या करना चाहिए? इसका उत्तर अपने ही भीतर से प्रतिध्वनित होता है- परिवर्तन। ढर्रे का परित्याग और नववर्ष के साथ ही साधनापरायण नवजीवन का शुभारम्भ। यही वे हलचलें हैं जो इन दिनों हममें से अधिकाँश के अन्तःकरणों में उठ-उभर रही हैं। इन्हें आँखों से तो देखा नहीं जा सकता, परन्तु अन्तःकरण को विकल कर देने वाली इन हलचलों का महत्व प्रत्यक्ष घटनाक्रमों से कम नहीं अधिक ही है, क्योंकि अन्तर्जगत् की हलचल ही तो प्रकारान्तर से बाह्यजगत में घटनाओं का सृजन करती हैं।
जाग्रत आत्माओं के अंतर्जगत में भगवान महाकाल उन्हें तीन सन्देश दे रहे हैं। इन्हें गंगा, यमुना व सरस्वती का मिलन-संगम कहा जा सकता है। दैवी सन्देश देने वाले महापर्व वसन्त पर अवतरित होने वाली त्रिपदा गायत्री की इन्हें तीन प्रकाश किरणें जिनके आलोक में वर्तमान को समझ सकना और भविष्य का निर्माण कर सकना सम्भव हो सके।
नववर्ष 1999 का वसंत पर्व इस बार अपने परिवार के सभी स्वजनों को कुछ अनोखा, कुछ अनूठा सुनाने आया है। उन्हें उनके उत्तरदायित्वों का बोध कराने आया है। इन दिनों प्रक्रिया कुछ ऐसी चल पड़ी है कि महाकाल सोते अन्धकार से जाग्रत प्रकाश की ओर, मरण से अमृतत्व की ओर, असत से सत की ओर चल पड़ने के लिए अपने परिजन ही नहीं विश्व का हर विचारशील यह अनुभव करने लगा है कि परिवर्तन की घड़ी निकट आ पहुँची है, अब उसे अधिक समय तक टाला न जा सकेगा। कायाकल्प की वेला को ऐसे ही झुठला देने, टरका देने की छलना प्रयास तो बहुत करती है, पर उसकी दाल इस बार किसी भी तरह गलने वाली नहीं। सर्प भी अनुकूल ऋतु में केंचुली बदल लेता है। नरजीवन पर छाई हुई पशुवृत्तियों की केंचुली असंख्यों को इसी वर्ष उतारने के लिए विवश होना पड़ेगा।
नववर्ष के अनुरूप नवजीवन के लिए तीन दिव्य सन्देश हैं- (1) जीवन व्यवसाय में परमपूज्य गुरुदेव की साझेदारी को कारगर बनाया जाय।(2) साधना की प्रखरता को अन्य दैनिक आवश्यकताओं की ही तरह नित्यकर्म में सम्मिलित एवं संपर्क क्षेत्र में आने वाले परिजनों को भी इसके लिए प्रेरित किया जाय। (3) जीवन को इतना शानदार बनाया जाय, जिसमें आत्मसंतोष, ईश्वरीय अनुकम्पा और लोक श्रद्धा का समन्वित वरदान मिल सके।
भगवान सन्देश देकर अपनी अनुकम्पा पूर्ण कर देते हैं। इसी के उपरान्त मनुष्य का कर्तव्य आरम्भ होता है। दिव्य सन्देशों को स्वभाव-अभ्यास में उतारने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है
इसी का नाम तप-साधना है। वैसे भी महाकाल ने इस वर्ष को प्रखर साधना वर्ष के रूप में मनाने का निर्देश दिया है। विभूतियाँ साधना से ही मिलती हैं। भगवान सीधे किसी पर अनुदानों-वरदानों की वर्षा नहीं करते। यदि वे ऐसा करें तो फिर मनुष्य बुरी तरह अकर्मण्य हो जाय। फिर पुरुषार्थ और पात्रता की कोई आवश्यकता ही न रहे और सर्वत्र भयंकर अंधेर मच जाय।
साहस की कसौटी पर ही प्रखरता की परख होती है। इन दिनों युगसेनानियों के अंतर्जगत में उभरती हुई इन भावसंवेदनाओं में नवयुग के अवतरण की प्रथम किरणों का दिव्य दर्शन सहज ही किया जा सकता है।

