पंगु धर्म को सहारा दीजिए
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इस युग में धर्म पंगु है। इसे सहारा देकर खड़ा कर दिया जाए तो खड़ा रह सकता है अन्यथा सहारे के अभाव में लड़खड़ा कर गिर पड़ता जाएगा। कमजोर पैरों वाला मनुष्य जिस प्रकार खड़े होने, चलने-फिरने के लिए किसी का सहारा ढूंढ़ता रहता है, वही स्थिति आज धर्म की है। सहारा न मिले तो वह आगे चलना तो दूर अपने स्थान पर भी सीधा खड़ा नहीं रह पाता। पूर्वकाल में युग प्रभाव से हर मनुष्य के हृदय में धार्मिक प्रवृत्ति, प्रेरणा, आस्था और श्रद्धा, पर्याप्त मात्रा में रहती थी। इसलिए वह अपने जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए आवश्यक सत्कर्मों को स्वयं करता था। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का स्रोत उसके अंतःकरण में से स्वयं फूटता रहता था। फलस्वरूप कर्त्तव्य-धर्म मार्ग पर उसकी जीवन-यात्रा स्वाभाविक रीति से चलती रहती थी। सभी धर्मात्मा होते थे, सभी अपने कर्त्तव्य, धर्म को पहचानते थे, सभी को अपने सुरदुर्लभ मानव शरीर की महानता का ज्ञान था, सभी अपने जीवन को सफल बनाने के लिए सत्कर्मों की स्वयं चिंता करते थे। उस पूर्वकाल में यह संसार स्वर्गभूमि बना हुआ था। सभी प्राणी आनंद की क्रीड़ा करते हुए नर तन को अपूर्व सौभाग्य मानते थे। सभी कंठों से एक स्वर में निकलता था—‘‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’’ मनुष्यों का मनःक्षेत्र पारस्परिक सहयोग और सद्भाव से, प्रेम और सेवा की तरंगों से सदा सर्वदा तरंगित रहता था। फलस्वरूप भौतिक जगत में भी सुख-साधन की वस्तुएं इतनी अधिक मात्रा में उपस्थित रहती थीं कि किसी कहीं वस्तु का घाटा ही न दीखता था। अभावग्रस्त, चिंतन, दुखी, पीड़ित सताए हुए मनुष्य तो कहीं दीख न पड़ते थे।
आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। संसार में उपभोग और आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में भरी पड़ी हैं, पर थोड़े से आदमी उस पर कब्जा करके बैठ जाते हैं। फलस्वरूप शेष सारी जनता अभावग्रस्त, दरिद्र रह जाती है। कोई व्यक्ति जीवन-यापन के जितनी वस्तुओं से संतुष्ट नहीं रहना चाहता है। हर किसी को अधिक, बहुत असीम वस्तुओं के संग्रह और उपभोग की तृष्णा व्याकुल किए हुए है, गरीब से लेकर अमीर तक, मजदूर से लेकर मालिक तक, शिष्य से लेकर गुरु तक, सभी अपने कर्त्तव्य पालन में अधिक से अधिक कंजूसी करना चाहते हैं और अधिकार के लिए बड़ी-बड़ी मांगे उपस्थित कर रहे हैं। कोई किसी को अपनी सच्ची आत्मीयता, सेवा, स्नेह भावना नहीं देना चाहता, अपनी वस्तुओं या अधिकारों का त्याग दूसरों के लिए नहीं करना चाहता, वरन् दूसरों से अधिक से अधिक लाभ किस प्रकार उठाया जा सकता है, इसी की फिराक में रहता है। इस घुड़दौड़ में वह उचित-अनुचित में, पाप-पुण्य में, नीति-अनीति में कोई अंतर नहीं करना चाहता। जैसे भी बने अपना काम बनाने की उसे चिंता है।
इस परिस्थिति में मनुष्य के सामने दो ही समस्याएं उपस्थित रहती हैं—(1) अधिक शौक-मौज, भोग-विलास, संपत्ति संग्रह, स्वामित्व, रौब-दाब, सत्ता, अधिकार, पद, बड़प्पन के सुख-साधनों को किस प्रकार संग्रह किया जाए? (2) इस व्यापक स्वार्थ-परता की घुड़दौड़ में जन-समाज में जो परस्पर संघर्ष बचा रहता है—शोषित आत्मरक्षा के लिए, शोषक आक्रमण के लिए जो उपद्रव करते हैं उनमें अपनी विजय कैसे हो? स्वार्थपरता की असीम तृष्णा में वस्तु प्राप्ति नहीं होती। अतएव उस दृष्टिकोण के व्यक्ति अपने को सदा दरिद्र, अभावग्रस्त, दुखी अनुभव करते रहते हैं। नीति का मार्ग छोड़कर जब लोग अनीति की सहायता से अपना स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं, तो निश्चित रूप से विरोध, द्वेष, संघर्ष और कलह उत्पन्न होता है। यह कलह अनेक रूप धारण करके सामने आता है और उससे शांति एवं सुरक्षा का वातावरण नष्ट हो जाता है। आज यही स्थिति है। इससे हर कोई परेशान है। आत्मरक्षा या आक्रमण को, विलास और संग्रह के ताने-बाने बुनने में से किसी के पास विचार एवं समय शेष नहीं रहता। दिन-रात के चौबीस घंटे प्रायः इसी गोरखधंधे में आज साधारण जनता व्यतीत करती है।
फिर धर्म-कर्त्तव्यों के लिए समय कहां से मिले? धार्मिक भावनाओं का प्रवेश मन में किस प्रकार हो? आत्मचिंतन की प्रेरणा कहां से आए? सभी घोर घोर स्वार्थपरता में डूबे हुए, भौतिक समस्याओं में उलझे हुए मनुष्य दिखते हैं तो कोई व्यक्ति एकाकी, अपनी अलग रास्ता बनाने की इच्छा भी नहीं करता। सब उसी सांचे में ढलते चले जाते हैं। देखा-देखी से उत्साह प्राप्त करने, अनुकरण करने में प्रसन्न होने की मानसिक कमजोरी के कारण लोग उसी दिशा में बहते चले जाते हैं जिसमें अन्य सब लोग बहते हैं। इस प्रक्रिया के कारण आज जन-मानस प्रवाह एक बुरे मार्ग पर चल रहा है। धर्म और परमार्थ के वास्तविक आदर्शों की ओर सच्चे मन से चलने वाले कोई बिरले ही मिलते हैं। जहां इस प्रकार कुछ दिखता भी है वहां अधिकांश में गुरुडम, व्यक्ति पूजा-संप्रदायवाद अथवा अन्य प्रकार के छल-प्रपंचों से परिपूर्ण पाखंड ही देखा जाता है।
इन परिस्थितियों में धर्म का पंगु हो जाना स्वाभाविक ही है। मनुष्य में पाशविकता की अधिक और देवत्व की स्वल्प मात्रा होती है—पतनकारी—अधोमुखी प्रवृत्तियां बड़ी और सरल एवं गतिशील होती हैं। एक बाल्टी पानी फैला दिया जाए तो वह बिना किसी प्रयत्न के नीचे की ओर ढलवां भूमि में अपना रास्ता आसानी से बनाता हुआ बह निकलेगा, किंतु यदि पानी को ऊपर की दिशा में चढ़ाना हो, तो अनेक साधन-सामग्री, मशीन, मजदूरी आदि की व्यवस्था करनी पड़ेगी। सन्मार्ग की ओर मनोभावनाओं को मोड़ने के लिए भी बहुत प्रयत्न करने पड़ते हैं, तब कहीं थोड़ी प्रगति होती है। यदि पानी को ऊपर खींचने के साधन न हों, तो वह जहां का तहां पड़ा रहेगा ऊपर न चढ़ सकेगा। जिस प्रकार पानी पंगु है, उसी प्रकार धर्म भी पंगु है। बिना सहारा पाए न तो पानी ऊपर चढ़ता है और न धर्म का अभ्युदय होता है। उन दोनों ही कामों के लिए सहारे की, सहारा देने वाले की जरूरत पड़ती है।
जब-जब धर्म को सहारा देने वाले मिल जाते हैं, तब वह खड़ा हो जाता है। जब उसे कोई सहारा नहीं देता है तब वह लुंज-पुंज होकर एक कोने में बैठ जाता है। अंधे का सहारा उसकी लकड़ी न हो तो अंधे को रास्ता पार करना मुश्किल हो जाए। युग प्रभाव से आज धर्म की भी यही स्थिति है। कुछ धर्मप्रेमी लोग दूसरों को सत्कर्म, पूजा-उपासना, सामूहिक सेवा आदि करने के लिए प्रेरणा देते रहते हैं और दूसरों के पीछे पड़कर उनसे इच्छा-अनिच्छा के साथ आग्रह, अनुरोध, मित्रता, खुशामद, नाराजगी, प्रार्थना शिक्षा आदि के आधार पर कुछ कराते रहते हैं, तो काम कुछ होता दिखता है, पर जब वह प्रेरणा देने वाले कुछ ढीले पड़ते हैं तभी वे किसी प्रकार तैयार किए व्यक्ति कंधा डाल देते हैं। उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। एक बार छोड़े हुए कार्य को पुनः आरंभ करने में उन्हें कुछ हेठी, झिझक, संकोच की सी स्थिति मालूम पड़ती है। इसलिए वे दुबारा कहने-सुनने पर पहले से अधिक शिथिल बन जाते हैं।
गायत्री उपासना का जो व्यापक कार्यक्रम देश भर में चलाया जा रहा है, यह बात केवल उसी के संबंध में नहीं है, वरन् यह एक व्यापक समस्या है। सभी सत्कार्यों में इन दिनों सर्वत्र एक बात भिन्न-भिन्न प्रकारों से चरितार्थ होती है। सभा व्याख्यानों में, सत्संगों में, किन्हीं विशाल आयोजनों से प्रभावित होकर कई व्यक्ति कुछ शुभ कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। कुछ दिनों तक उनका वह क्रम चलता भी है, पर थोड़े ही दिनों में शिथिलता आने लगती है, परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उनका सारा उत्साह, उल्लास समाप्त हो जाता है। इस मामले में अधिकांश लोगों के साथ ऐसा ही होता है। जबकि आज की परिस्थितियों को देखते हुए संसार में से अशांति और अभाव को हटाकर सुख-शांति की स्थापना के लिए धार्मिक उपासनाओं तथा व्यावहारिक जीवन में धार्मिक प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना अतीव आवश्यक है, पर मार्ग में एक भारी कठिनाई यह है कि यह कार्य आसानी से होने वाला नहीं है। लेखनी और वाणी से, पुस्तकों और प्रवचनों से निस्संदेह इस दिशा में बड़ी सहायता मिलती है, पर यह सहायता ‘जमीन तैयार करने’ जितनी ही है। दृढ़, स्थाई और ठोस कार्य तभी होंगे जब उसके मूल में धर्म को अपने कंधे का सहारा देने, अंधे की लकड़ी का सहारा बनने जैसे कुछ व्रतधारी कर्मठ धर्मात्मा कटिबद्ध होंगे। इस युग में धर्म पंगु है। उसे सहारा न मिलेगा तो खड़ा न रह सकेगा। कुछ प्रयत्न किए भी जाएं तो वे कुछ समय में उत्साह मंद होने पर स्वयमेव समाप्त हो जाएंगे। यदि प्रेरणा देने वाले नैष्ठिक कार्यकर्त्ताओं की शक्ति उसके पीछे होगी तो ही वह सत्कार्य खड़ा रहेगा, आगे बढ़ेगा।
प्राचीनकाल में सभी के मन में धर्म प्रेरणा पर्याप्त मात्रा में थी। इससे किसी सहायता की, शिक्षा की जरूरत बहुत कम पड़ती थी, इसलिए धर्म प्रचार कार्य की विशेष आवश्यकता न होने के कारण अनेकों अध्यात्म-प्रेमी व्यक्ति योगाभ्यास आदि एकांत साधनाओं में लग जाते थे, पर जब कभी परिस्थिति बदली या बिगड़ी है तब-तब सच्चे अध्यात्म—प्रेमी सत्पुरुषों ने धर्म को अपने कंधे का सहारा दिया है और उसे लड़खड़ा कर गिर पड़ने से बचाया है। देवर्षि नारद ने तो अपने जीवन की एकमात्र साधना परिव्रज्या करते हुए निरंतर धर्म प्रचार करते रहना ही बनाया था। शंकराचार्य, दयानंद, नानक, कबीर, मीरा, बुद्ध, महावीर, गांधी, विनोबा आदि के अगणित उदाहरण ऐसे हैं जिन्होंने एकांत में साधना-उपासना करने के बजाए समाज में रहकर जीवन भर धर्म प्रचार किया। उनका यह कार्य एकांत साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी से उनका खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती, पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर संपूर्ण विश्व में सुख-शांति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं दयालु और परोपकारी होते हैं, वे निजी लाभों की स्वर्ग-मुक्ति की भी परवाह न करके अनेकों दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जन-सेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।
मनुष्य की ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों की सुरक्षा, समृद्धि और सुख-शांति इस बात पर निर्भर है कि मनुष्यों के अंतःकरणों में निवास करने वाली सद्भावना, सात्विकता, उदारता और संयमशीलता कायम रहे। यह तत्व जितना ही घटेगा उतना ही दुनिया में सुख-शांति के साधन जुट जावेंगे। विश्व के इस अत्यंत महत्वपूर्ण मनःक्षेत्र को सुव्यवस्थित रखने के लिए प्राचीनकाल में सहस्रों साधु-ब्राह्मण अपना पूरा समय, अपना जीवन खपाए रहते थे, तब वह कार्य पूरा हो पाता था। आज उस मैदान को छोड़कर सभी कोई भाग गए हैं। यों तो तथाकथित साधु-संतों, पंडे-पुजारियों की संख्या लाखों के आंकड़ों से भी अधिक हैं, पर इनमें संभवतः हजार से भी कम ऐसे निकलेंगे जो मुफ्तखोरी, आलस्य, मटरगस्ती या मुक्ति का जो विचित्र रूप उन्होंने मान रखा है, उस खुदगर्जी को छोड़कर विश्व में सतोगुण स्थिर रखने के लिए कुछ विचार या कार्य करते हों। अन्य साधारण परिस्थितियों के लोग राजनीति की ओर दौड़ते हैं। हर कोई एम.एल.ए., एम.पी. मिनिस्टर या कम से कम नेता बनने की फिराक में है। निश्चय ही राजनीति एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उसके द्वारा भौतिक विधि-व्यवस्था में बहुत योग मिलता है, पर यह भी निश्चित ही है कि मनुष्यों के मनःक्षेत्र यदि अधार्मिक, अनैतिक, पथभ्रष्ट, हो रहा हो तो राजनीति की सारी शक्ति लगाकर भी लोगों को असामाजिक, अवांछनीयता विचारों और कार्यों को रोक नहीं सकती है। भ्रष्टाचारी जनता और भ्रष्टाचारी शासनतंत्र, दोनों की जोड़ी एक अंधा एक कोढ़ी की उक्ति चरितार्थ करेंगी। ऊपर से किए हुए बड़े-बड़े पुरुषार्थ इन छिद्रों में होकर बह जावेंगे।
आज यही हो रहा है। करोड़ों रुपयों की कई योजनाएं अपना वास्तविक शुभ परिणाम उपस्थित करने के स्थान पर चंद लोगों की जेबें गरम करने मात्र की निमित्त बनकर असफल होती देखी जाती हैं। भ्रष्टाचार ऐसा ही असुर है जो भारी प्रयत्नों को भी क्षणमात्र में उदरस्थ कर जाता है। राजनीतिक प्रयत्न होने तथा शासनतंत्र को ईमानदार और सन्मार्गगामी रखने के एकमात्र साधन उनके धार्मिक विश्वासों को उचित दिशा में प्रवाहित करते रहने के लिए अंतरात्मा में निवास करने वाले उच्च आदर्शों, श्रद्धापूर्ण सिद्धांतों एवं सद्भावनाओं को भी सुरक्षित रखना और बढ़ाया जाना आवश्यक है, अन्यथा भ्रष्ट जन-समाज द्वारा जो अवांछनीय प्रवृत्तियां बढ़ेंगी उन्हें राजदंड की सीमित शक्ति द्वारा रोक सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा।
आज समय की, विवेक की, दूरदर्शिता की एक ही पुकार है कि जनता का धार्मिक नैतिक नेतृत्व करने के लिए कुछ हस्तियां निकल कर सामने आवें। नारद, बुद्ध, महावीर, दयानंद, शंकराचार्य, गांधी, नानक, मीरा आदि की तरह ऋषि परंपराओं को अपनाते हुए गिरती हुई धर्म भावनाओं को नष्ट होने से बचावें। नैतिक पतन एक भारी खतरा है, राजनैतिक पराधीनता से भी बड़ा खतरा है। इस खतरे से लड़ने के लिए शूरवीर योद्धाओं तथा आत्मज्ञानियों की जरूरत है। राजनीति के समान सत्ता, यश तथा अन्यान्य उचित, अनुचित लाभ प्राप्त करने का इस क्षेत्र का नेतृत्त्व करने वालों के लिए अवसर नहीं है, पर जो अवसर है वह इतना महान है कि किसी राष्ट्र या जाति का जीवन-मरण उसी पर निर्भर है।
धार्मिक नेतृत्त्व कर सकने वाले सुयोग्य व्यक्तियों की आज भारी आवश्यकता है। इतनी भारी जितनी संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई। इस क्षेत्र में आज सुयोग्य और सच्चे व्यक्तियों की आवश्यकता के लिए कुहराम मचा हुआ है, अभाव के कारण हाहाकार हो रहा है, पर नेता बनने को कोई तैयार नहीं होता।
राष्ट्र निर्माण के लिए, सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए, अपने अतीत गौरव को वापिस लाने के लिए हमें कुछ काम करना पड़ेगा। समय और श्रम देना पड़ेगा। आज का भगवान नर-नारायण, चंदन-पुष्प, धूप-दीप से संतुष्ट होने वाला नहीं है। उसे भक्त का प्रयत्न, पुरुषार्थ, समय और सहयोग चाहिए। आंसू बहाने वाले भक्त की नहीं, उसे पसीना बहाने वाले भक्त की आवश्यकता है। तीर्थयात्रा करने वाले भक्त की नहीं धर्म-प्रेरणा के लिए लगाई जाने वाली धर्मफेरी से वह संतुष्ट होगा। आइए, हम अपने प्रभु की, राष्ट्र की, धर्म की, आज की इच्छा और आवश्यकता को समझें और उसके अनुसार कुछ करने को कटिबद्ध हों।
आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। संसार में उपभोग और आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में भरी पड़ी हैं, पर थोड़े से आदमी उस पर कब्जा करके बैठ जाते हैं। फलस्वरूप शेष सारी जनता अभावग्रस्त, दरिद्र रह जाती है। कोई व्यक्ति जीवन-यापन के जितनी वस्तुओं से संतुष्ट नहीं रहना चाहता है। हर किसी को अधिक, बहुत असीम वस्तुओं के संग्रह और उपभोग की तृष्णा व्याकुल किए हुए है, गरीब से लेकर अमीर तक, मजदूर से लेकर मालिक तक, शिष्य से लेकर गुरु तक, सभी अपने कर्त्तव्य पालन में अधिक से अधिक कंजूसी करना चाहते हैं और अधिकार के लिए बड़ी-बड़ी मांगे उपस्थित कर रहे हैं। कोई किसी को अपनी सच्ची आत्मीयता, सेवा, स्नेह भावना नहीं देना चाहता, अपनी वस्तुओं या अधिकारों का त्याग दूसरों के लिए नहीं करना चाहता, वरन् दूसरों से अधिक से अधिक लाभ किस प्रकार उठाया जा सकता है, इसी की फिराक में रहता है। इस घुड़दौड़ में वह उचित-अनुचित में, पाप-पुण्य में, नीति-अनीति में कोई अंतर नहीं करना चाहता। जैसे भी बने अपना काम बनाने की उसे चिंता है।
इस परिस्थिति में मनुष्य के सामने दो ही समस्याएं उपस्थित रहती हैं—(1) अधिक शौक-मौज, भोग-विलास, संपत्ति संग्रह, स्वामित्व, रौब-दाब, सत्ता, अधिकार, पद, बड़प्पन के सुख-साधनों को किस प्रकार संग्रह किया जाए? (2) इस व्यापक स्वार्थ-परता की घुड़दौड़ में जन-समाज में जो परस्पर संघर्ष बचा रहता है—शोषित आत्मरक्षा के लिए, शोषक आक्रमण के लिए जो उपद्रव करते हैं उनमें अपनी विजय कैसे हो? स्वार्थपरता की असीम तृष्णा में वस्तु प्राप्ति नहीं होती। अतएव उस दृष्टिकोण के व्यक्ति अपने को सदा दरिद्र, अभावग्रस्त, दुखी अनुभव करते रहते हैं। नीति का मार्ग छोड़कर जब लोग अनीति की सहायता से अपना स्वार्थ पूरा करना चाहते हैं, तो निश्चित रूप से विरोध, द्वेष, संघर्ष और कलह उत्पन्न होता है। यह कलह अनेक रूप धारण करके सामने आता है और उससे शांति एवं सुरक्षा का वातावरण नष्ट हो जाता है। आज यही स्थिति है। इससे हर कोई परेशान है। आत्मरक्षा या आक्रमण को, विलास और संग्रह के ताने-बाने बुनने में से किसी के पास विचार एवं समय शेष नहीं रहता। दिन-रात के चौबीस घंटे प्रायः इसी गोरखधंधे में आज साधारण जनता व्यतीत करती है।
फिर धर्म-कर्त्तव्यों के लिए समय कहां से मिले? धार्मिक भावनाओं का प्रवेश मन में किस प्रकार हो? आत्मचिंतन की प्रेरणा कहां से आए? सभी घोर घोर स्वार्थपरता में डूबे हुए, भौतिक समस्याओं में उलझे हुए मनुष्य दिखते हैं तो कोई व्यक्ति एकाकी, अपनी अलग रास्ता बनाने की इच्छा भी नहीं करता। सब उसी सांचे में ढलते चले जाते हैं। देखा-देखी से उत्साह प्राप्त करने, अनुकरण करने में प्रसन्न होने की मानसिक कमजोरी के कारण लोग उसी दिशा में बहते चले जाते हैं जिसमें अन्य सब लोग बहते हैं। इस प्रक्रिया के कारण आज जन-मानस प्रवाह एक बुरे मार्ग पर चल रहा है। धर्म और परमार्थ के वास्तविक आदर्शों की ओर सच्चे मन से चलने वाले कोई बिरले ही मिलते हैं। जहां इस प्रकार कुछ दिखता भी है वहां अधिकांश में गुरुडम, व्यक्ति पूजा-संप्रदायवाद अथवा अन्य प्रकार के छल-प्रपंचों से परिपूर्ण पाखंड ही देखा जाता है।
इन परिस्थितियों में धर्म का पंगु हो जाना स्वाभाविक ही है। मनुष्य में पाशविकता की अधिक और देवत्व की स्वल्प मात्रा होती है—पतनकारी—अधोमुखी प्रवृत्तियां बड़ी और सरल एवं गतिशील होती हैं। एक बाल्टी पानी फैला दिया जाए तो वह बिना किसी प्रयत्न के नीचे की ओर ढलवां भूमि में अपना रास्ता आसानी से बनाता हुआ बह निकलेगा, किंतु यदि पानी को ऊपर की दिशा में चढ़ाना हो, तो अनेक साधन-सामग्री, मशीन, मजदूरी आदि की व्यवस्था करनी पड़ेगी। सन्मार्ग की ओर मनोभावनाओं को मोड़ने के लिए भी बहुत प्रयत्न करने पड़ते हैं, तब कहीं थोड़ी प्रगति होती है। यदि पानी को ऊपर खींचने के साधन न हों, तो वह जहां का तहां पड़ा रहेगा ऊपर न चढ़ सकेगा। जिस प्रकार पानी पंगु है, उसी प्रकार धर्म भी पंगु है। बिना सहारा पाए न तो पानी ऊपर चढ़ता है और न धर्म का अभ्युदय होता है। उन दोनों ही कामों के लिए सहारे की, सहारा देने वाले की जरूरत पड़ती है।
जब-जब धर्म को सहारा देने वाले मिल जाते हैं, तब वह खड़ा हो जाता है। जब उसे कोई सहारा नहीं देता है तब वह लुंज-पुंज होकर एक कोने में बैठ जाता है। अंधे का सहारा उसकी लकड़ी न हो तो अंधे को रास्ता पार करना मुश्किल हो जाए। युग प्रभाव से आज धर्म की भी यही स्थिति है। कुछ धर्मप्रेमी लोग दूसरों को सत्कर्म, पूजा-उपासना, सामूहिक सेवा आदि करने के लिए प्रेरणा देते रहते हैं और दूसरों के पीछे पड़कर उनसे इच्छा-अनिच्छा के साथ आग्रह, अनुरोध, मित्रता, खुशामद, नाराजगी, प्रार्थना शिक्षा आदि के आधार पर कुछ कराते रहते हैं, तो काम कुछ होता दिखता है, पर जब वह प्रेरणा देने वाले कुछ ढीले पड़ते हैं तभी वे किसी प्रकार तैयार किए व्यक्ति कंधा डाल देते हैं। उनका उत्साह ठंडा पड़ जाता है। एक बार छोड़े हुए कार्य को पुनः आरंभ करने में उन्हें कुछ हेठी, झिझक, संकोच की सी स्थिति मालूम पड़ती है। इसलिए वे दुबारा कहने-सुनने पर पहले से अधिक शिथिल बन जाते हैं।
गायत्री उपासना का जो व्यापक कार्यक्रम देश भर में चलाया जा रहा है, यह बात केवल उसी के संबंध में नहीं है, वरन् यह एक व्यापक समस्या है। सभी सत्कार्यों में इन दिनों सर्वत्र एक बात भिन्न-भिन्न प्रकारों से चरितार्थ होती है। सभा व्याख्यानों में, सत्संगों में, किन्हीं विशाल आयोजनों से प्रभावित होकर कई व्यक्ति कुछ शुभ कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। कुछ दिनों तक उनका वह क्रम चलता भी है, पर थोड़े ही दिनों में शिथिलता आने लगती है, परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे उनका सारा उत्साह, उल्लास समाप्त हो जाता है। इस मामले में अधिकांश लोगों के साथ ऐसा ही होता है। जबकि आज की परिस्थितियों को देखते हुए संसार में से अशांति और अभाव को हटाकर सुख-शांति की स्थापना के लिए धार्मिक उपासनाओं तथा व्यावहारिक जीवन में धार्मिक प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना अतीव आवश्यक है, पर मार्ग में एक भारी कठिनाई यह है कि यह कार्य आसानी से होने वाला नहीं है। लेखनी और वाणी से, पुस्तकों और प्रवचनों से निस्संदेह इस दिशा में बड़ी सहायता मिलती है, पर यह सहायता ‘जमीन तैयार करने’ जितनी ही है। दृढ़, स्थाई और ठोस कार्य तभी होंगे जब उसके मूल में धर्म को अपने कंधे का सहारा देने, अंधे की लकड़ी का सहारा बनने जैसे कुछ व्रतधारी कर्मठ धर्मात्मा कटिबद्ध होंगे। इस युग में धर्म पंगु है। उसे सहारा न मिलेगा तो खड़ा न रह सकेगा। कुछ प्रयत्न किए भी जाएं तो वे कुछ समय में उत्साह मंद होने पर स्वयमेव समाप्त हो जाएंगे। यदि प्रेरणा देने वाले नैष्ठिक कार्यकर्त्ताओं की शक्ति उसके पीछे होगी तो ही वह सत्कार्य खड़ा रहेगा, आगे बढ़ेगा।
प्राचीनकाल में सभी के मन में धर्म प्रेरणा पर्याप्त मात्रा में थी। इससे किसी सहायता की, शिक्षा की जरूरत बहुत कम पड़ती थी, इसलिए धर्म प्रचार कार्य की विशेष आवश्यकता न होने के कारण अनेकों अध्यात्म-प्रेमी व्यक्ति योगाभ्यास आदि एकांत साधनाओं में लग जाते थे, पर जब कभी परिस्थिति बदली या बिगड़ी है तब-तब सच्चे अध्यात्म—प्रेमी सत्पुरुषों ने धर्म को अपने कंधे का सहारा दिया है और उसे लड़खड़ा कर गिर पड़ने से बचाया है। देवर्षि नारद ने तो अपने जीवन की एकमात्र साधना परिव्रज्या करते हुए निरंतर धर्म प्रचार करते रहना ही बनाया था। शंकराचार्य, दयानंद, नानक, कबीर, मीरा, बुद्ध, महावीर, गांधी, विनोबा आदि के अगणित उदाहरण ऐसे हैं जिन्होंने एकांत में साधना-उपासना करने के बजाए समाज में रहकर जीवन भर धर्म प्रचार किया। उनका यह कार्य एकांत साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी से उनका खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती, पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर संपूर्ण विश्व में सुख-शांति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं दयालु और परोपकारी होते हैं, वे निजी लाभों की स्वर्ग-मुक्ति की भी परवाह न करके अनेकों दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जन-सेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।
मनुष्य की ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों की सुरक्षा, समृद्धि और सुख-शांति इस बात पर निर्भर है कि मनुष्यों के अंतःकरणों में निवास करने वाली सद्भावना, सात्विकता, उदारता और संयमशीलता कायम रहे। यह तत्व जितना ही घटेगा उतना ही दुनिया में सुख-शांति के साधन जुट जावेंगे। विश्व के इस अत्यंत महत्वपूर्ण मनःक्षेत्र को सुव्यवस्थित रखने के लिए प्राचीनकाल में सहस्रों साधु-ब्राह्मण अपना पूरा समय, अपना जीवन खपाए रहते थे, तब वह कार्य पूरा हो पाता था। आज उस मैदान को छोड़कर सभी कोई भाग गए हैं। यों तो तथाकथित साधु-संतों, पंडे-पुजारियों की संख्या लाखों के आंकड़ों से भी अधिक हैं, पर इनमें संभवतः हजार से भी कम ऐसे निकलेंगे जो मुफ्तखोरी, आलस्य, मटरगस्ती या मुक्ति का जो विचित्र रूप उन्होंने मान रखा है, उस खुदगर्जी को छोड़कर विश्व में सतोगुण स्थिर रखने के लिए कुछ विचार या कार्य करते हों। अन्य साधारण परिस्थितियों के लोग राजनीति की ओर दौड़ते हैं। हर कोई एम.एल.ए., एम.पी. मिनिस्टर या कम से कम नेता बनने की फिराक में है। निश्चय ही राजनीति एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उसके द्वारा भौतिक विधि-व्यवस्था में बहुत योग मिलता है, पर यह भी निश्चित ही है कि मनुष्यों के मनःक्षेत्र यदि अधार्मिक, अनैतिक, पथभ्रष्ट, हो रहा हो तो राजनीति की सारी शक्ति लगाकर भी लोगों को असामाजिक, अवांछनीयता विचारों और कार्यों को रोक नहीं सकती है। भ्रष्टाचारी जनता और भ्रष्टाचारी शासनतंत्र, दोनों की जोड़ी एक अंधा एक कोढ़ी की उक्ति चरितार्थ करेंगी। ऊपर से किए हुए बड़े-बड़े पुरुषार्थ इन छिद्रों में होकर बह जावेंगे।
आज यही हो रहा है। करोड़ों रुपयों की कई योजनाएं अपना वास्तविक शुभ परिणाम उपस्थित करने के स्थान पर चंद लोगों की जेबें गरम करने मात्र की निमित्त बनकर असफल होती देखी जाती हैं। भ्रष्टाचार ऐसा ही असुर है जो भारी प्रयत्नों को भी क्षणमात्र में उदरस्थ कर जाता है। राजनीतिक प्रयत्न होने तथा शासनतंत्र को ईमानदार और सन्मार्गगामी रखने के एकमात्र साधन उनके धार्मिक विश्वासों को उचित दिशा में प्रवाहित करते रहने के लिए अंतरात्मा में निवास करने वाले उच्च आदर्शों, श्रद्धापूर्ण सिद्धांतों एवं सद्भावनाओं को भी सुरक्षित रखना और बढ़ाया जाना आवश्यक है, अन्यथा भ्रष्ट जन-समाज द्वारा जो अवांछनीय प्रवृत्तियां बढ़ेंगी उन्हें राजदंड की सीमित शक्ति द्वारा रोक सकना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा।
आज समय की, विवेक की, दूरदर्शिता की एक ही पुकार है कि जनता का धार्मिक नैतिक नेतृत्व करने के लिए कुछ हस्तियां निकल कर सामने आवें। नारद, बुद्ध, महावीर, दयानंद, शंकराचार्य, गांधी, नानक, मीरा आदि की तरह ऋषि परंपराओं को अपनाते हुए गिरती हुई धर्म भावनाओं को नष्ट होने से बचावें। नैतिक पतन एक भारी खतरा है, राजनैतिक पराधीनता से भी बड़ा खतरा है। इस खतरे से लड़ने के लिए शूरवीर योद्धाओं तथा आत्मज्ञानियों की जरूरत है। राजनीति के समान सत्ता, यश तथा अन्यान्य उचित, अनुचित लाभ प्राप्त करने का इस क्षेत्र का नेतृत्त्व करने वालों के लिए अवसर नहीं है, पर जो अवसर है वह इतना महान है कि किसी राष्ट्र या जाति का जीवन-मरण उसी पर निर्भर है।
धार्मिक नेतृत्त्व कर सकने वाले सुयोग्य व्यक्तियों की आज भारी आवश्यकता है। इतनी भारी जितनी संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई। इस क्षेत्र में आज सुयोग्य और सच्चे व्यक्तियों की आवश्यकता के लिए कुहराम मचा हुआ है, अभाव के कारण हाहाकार हो रहा है, पर नेता बनने को कोई तैयार नहीं होता।
राष्ट्र निर्माण के लिए, सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए, अपने अतीत गौरव को वापिस लाने के लिए हमें कुछ काम करना पड़ेगा। समय और श्रम देना पड़ेगा। आज का भगवान नर-नारायण, चंदन-पुष्प, धूप-दीप से संतुष्ट होने वाला नहीं है। उसे भक्त का प्रयत्न, पुरुषार्थ, समय और सहयोग चाहिए। आंसू बहाने वाले भक्त की नहीं, उसे पसीना बहाने वाले भक्त की आवश्यकता है। तीर्थयात्रा करने वाले भक्त की नहीं धर्म-प्रेरणा के लिए लगाई जाने वाली धर्मफेरी से वह संतुष्ट होगा। आइए, हम अपने प्रभु की, राष्ट्र की, धर्म की, आज की इच्छा और आवश्यकता को समझें और उसके अनुसार कुछ करने को कटिबद्ध हों।

